हनुमानगढ़। माघ शुदी पंचमी को मनाया जाने वाला बसंत पंचमी पर्व भारतीय संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। इस अवसर पर विद्वान धर्माचार्य पंडित रतनलाल शास्त्री ने बसंत पंचमी के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। पं. शास्त्री ने बताया कि बसंत पंचमी त्रिदेवी महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती में से भगवती महासरस्वती को समर्पित पर्व है। शास्त्रों के अनुसार इसी दिन भगवती सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ था। सरस्वती वाग्देवी एवं विद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं और उनका स्वरूप पूर्णत: सात्विक माना गया है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रत्येक दिन किसी न किसी पर्व से जुड़ा होता है, जो तिथि, नक्षत्र, योग और करण के आधार पर निर्धारित होता है। सृष्टि के प्रारंभ में ईश्वर की कृपा से भगवती ने तीन स्वरूपों में अवतार लिया। महाकाली शक्ति की प्रतीक हैं, महालक्ष्मी वैभव और समृद्धि का स्वरूप हैं, जबकि महासरस्वती ज्ञान, विवेक और सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री हैं।
सरस्वती का प्रभाव मनुष्य जीवन में सर्वाधिक
पं. शास्त्री के अनुसार, सरस्वती का प्रभाव मनुष्य जीवन पर सर्वाधिक होता है। जब भगवती सरस्वती जीव पर कृपा करती हैं, तो उसमें स्वत: सात्विक भाव जागृत हो जाते हैं। हिंसा, क्रोध और तामसी प्रवृत्तियों का अंत हो जाता है। ज्ञान सात्विक बनता है और व्यक्ति का मानसिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास होता है। उन्होंने बताया कि शास्त्रों में सरस्वती को अत्यंत शक्तिशाली देवी कहा गया है। जिस जीव पर सरस्वती की कृपा होती है, उस पर महालक्ष्मी और महाकाली की कृपा भी स्वत: प्राप्त हो जाती है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में सर्वांगीण समृद्धि आती है।
बसंत पंचमी पर विशेष आराधना का विधान
पं. शास्त्री ने कहा कि बसंत पंचमी के दिन विशेष आराधना का विधान है। इस दिन किए गए पूजा-पाठ, अनुष्ठान और मंत्र-जप शीघ्र फलदायी होते हैं। विशेष रूप से विद्यालयों, पाठशालाओं और गुरुकुलों में सरस्वती वंदना और पूजा का आयोजन किया जाता है। विद्यार्थियों को प्रात:काल भगवती सरस्वती का स्मरण कर घी का दीपक जलाना, सरस्वती स्तोत्र का पाठ और मंत्र-जप करना चाहिए। उन्होंने बताया कि इस दिन सरस्वती की आराधना करने से विद्यार्थियों और ज्ञान की कामना रखने वालों पर विशेष कृपा होती है। ऋषि-मुनि, तपस्वी और श्रद्धालु इस दिन भगवती की आराधना कर अपने जीवन को आध्यात्मिक, भौतिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करने की प्रार्थना करते हैं।
पूजा विधि और धार्मिक कर्तव्य
पं. शास्त्री ने पूजा विधि बताते हुए कहा कि प्रात:काल सरस्वती की प्रतिमा या चित्र के समक्ष कुमकुम से तिलक करें, पुष्पमाला अर्पित करें और दीप प्रज्वलित करें। हाथ धोकर भगवती को नैवेद्य अर्पित करें, तत्पश्चात आरती कर पुष्पांजलि अर्पित करें। इस प्रकार की गई पूजा से सरस्वती आराधना पूर्ण मानी जाती है। उन्होंने बसंत पंचमी के दिन गोसेवा करने, देवालयों में जाकर पूजा-अर्चना करने, माता-पिता और गुरुजनों का वंदन करने पर विशेष बल दिया। विद्यार्थियों को अपनी पुस्तकों में स्वस्तिक चिन्ह बनाकर गणेश पूजन के पश्चात सरस्वती वंदना करने की सलाह दी गई। पं. शास्त्री ने कहा कि बसंत पंचमी ज्ञान के प्रकाश का पर्व है, जो जीवन को प्रज्वलित करने वाले प्रकाश-पुंज के रूप में हमारे जीवन में प्रवेश करता है। इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से की गई आराधना से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन और दिव्य कृपा प्राप्त होती है।
