फेफाना/चारणवासी। होली के अगले दिन से शुरू हुआ गणगौर का पावन पर्व 16 दिनों तक श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। इस दौरान विवाहित महिलाओं और युवतियों ने प्रतिदिन प्रातःकाल ईसर (भगवान शिव) और गणगौर (माता पार्वती) की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। परंपरा के अनुसार नवविवाहित महिलाएं और युवतियां समूह बनाकर कुओं से दूब लेकर आती थीं और उसी से गणगौर का पूजन करती थीं। बुजुर्ग बनवारी लाल जोशी ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार जो महिलाएं यह व्रत रखती हैं, उन्हें भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है तथा परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। गणगौर निकालने वाले घरों में स्थापित ईसर-गणगौर की प्रतिमाओं की सवारी 16वें दिन धागे (डोरा) के निमंत्रण पर आई महिलाओं के साथ निकाली गई। नवविवाहित महिलाओं ने सोलह श्रृंगार कर सिर पर ईसर-गणगौर की प्रतिमाएं रखीं और लोकगीत गाते हुए सवारी को प्राचीन कुएं तक लेकर पहुंचीं। इस दौरान महिलाएं पारंपरिक लोकगीत— “भंवर म्हाने पूजण द्यो गणगौर”, “गौर ए गणगौर माता खोल किवाड़ी”, “उदयापुर स्यूं आई गणगौर” आदि गाती हुई आगे बढ़ीं। रास्ते में जगह-जगह महिलाओं ने गणगौर सवारी पर पुष्प वर्षा कर स्वागत किया। कुएं पर पहुंचकर प्रतिमाओं को पानी पिलाने और ‘खोळा भरने’ की रस्म अदा की गई। इसके बाद महिलाओं ने ईसर-गणगौर की पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और पति की दीर्घायु की कामना करते हुए प्रतिमाओं का विसर्जन किया। इस अवसर पर घर-घर में पारंपरिक ‘ढोकळे’ भी बनाए गए, जिनकी सुगंध पूरे क्षेत्र में फैल गई। उल्लेखनीय है कि सावन की तीज से शुरू होने वाला त्योहारों का सिलसिला गणगौर विसर्जन के साथ ही अगले चार महीनों के लिए थम जाता है।
