– अधिवक्ताओं और प्रबुद्ध नागरिकों ने रखे अलग-अलग पक्ष: किसी ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर बल प्रयोग को बताया अनुचित, तो किसी ने विपक्ष की भूमिका पर उठाए सवाल
हनुमानगढ़। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शन के दौरान हुए विवाद और पुलिस कार्रवाई को लेकर बुधवार को हनुमानगढ़ में अधिवक्ताओं एवं प्रबुद्ध नागरिकों के बीच व्यापक चर्चा हुई। इस दौरान घटना को लेकर अलग-अलग मत सामने आए। कुछ वक्ताओं ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर बल प्रयोग की आलोचना की, जबकि अन्य ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस कार्रवाई को उचित ठहराते हुए विपक्ष की भूमिका पर सवाल उठाए। अधिवक्ता उग्रसेन नैण ने कहा कि जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को शांतिपूर्ण ढंग से रख रहे युवाओं पर लाठीचार्ज लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। उनका कहना था कि पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों की बात सुनने के बजाय बल प्रयोग किया गया, जो निंदनीय है। उन्होंने आरोप लगाया कि सिविल वर्दी में मौजूद लोगों ने भी छात्रों पर लाठियां चलाईं और छात्राओं के साथ अभद्र व्यवहार किया। बार संघ के पूर्व अध्यक्ष जितेन्द्र सारस्वत ने कहा कि छात्रों की मांग पूरी तरह न्यायोचित थी और उन्हें अपनी बात रखने का लोकतांत्रिक अधिकार है।

उन्होंने कहा कि बार-बार होने वाले पेपर लीक से युवाओं की वर्षों की मेहनत पर पानी फिर जाता है, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज तक लेते हैं। उनका कहना था कि ऐसे मामलों में सरकार को जवाबदेही तय करनी चाहिए और छात्रों की बात सुननी चाहिए, न कि बल प्रयोग करना चाहिए। वहीं सुरेन्द्र जलंधरा ने अलग दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि पेपर लीक सामने आने पर सरकार ने परीक्षा रद्द कर दोबारा आयोजित करवाई, जिससे आवश्यक कार्रवाई का परिचय मिलता है। उनका कहना था कि परीक्षा में असफल रहे छात्रों की निराशा स्वाभाविक है, लेकिन उस निराशा को राजनीतिक रंग देना उचित नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष ने छात्रों को गुमराह कर जंतर-मंतर पर एकत्रित किया। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस पर पथराव की स्थिति बनने के बाद कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सीमित बल प्रयोग किया गया। अधिवक्ता महावीर स्वामी ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रदर्शनकारियों की बात संवेदनशीलता के साथ सुनी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि छात्र अपनी समस्याओं को लेकर जंतर-मंतर पहुंचे थे तो सरकार को पहले उनसे संवाद करना चाहिए था। उनके अनुसार ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय वार्ता और समाधान का रास्ता अपनाया जाना चाहिए तथा आवश्यक होने पर इस विषय पर संसद में भी चर्चा होनी चाहिए। जंतर-मंतर की घटना को लेकर हुई इस चर्चा में लोकतांत्रिक अधिकार, छात्रों की समस्याएं, पेपर लीक की चुनौती, कानून-व्यवस्था और राजनीतिक जवाबदेही जैसे कई पहलुओं पर अलग-अलग मत सामने आए। कुल मिलाकर वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों का समाधान संवेदनशील संवाद और सकारात्मक पहल के माध्यम से होना चाहिए।
