हनुमानगढ़। संयुक्त निदेशक कृषि (विस्तार) कार्यालय, जिला परिषद हनुमानगढ़ की ओर से किसानों के लिए बीटी कपास उत्पादन को लेकर तकनीकी सलाह जारी की गई है। विभाग ने किसानों को निर्धारित समय, सही बीज, उचित दूरी और संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाने की अपील की है, ताकि बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सके। कृषि विभाग ने बताया कि बीटी कपास की बुवाई 1 मई से 20 मई के बीच करना उपयुक्त रहता है। इससे पहले की गई बुवाई में गुलाबी सुंडी का प्रकोप अधिक देखने को मिला है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे केवल अनुमोदित किस्मों के बीज ही खरीदें और बीज का पक्का बिल अवश्य लें। बीज की मात्रा प्रति बीघा 450 ग्राम रखने और कतार से कतार की दूरी 67.5 सेंटीमीटर तथा पौधों की दूरी 90 सेंटीमीटर रखने की सलाह दी गई है। वैकल्पिक रूप से 108 सेंटीमीटर कतार दूरी और 60 सेंटीमीटर पौध दूरी भी रखी जा सकती है, जिससे फसल में वायु संचार बेहतर होता है और रोगों का प्रकोप कम होता है। उर्वरक प्रबंधन के तहत प्रति बीघा 25 क्विंटल सड़ी-गली गोबर खाद डालने की सिफारिश की गई है। इसके साथ डीएपी, एमएपी, टीएसपी या सिंगल सुपर फॉस्फेट जैसे उर्वरकों का संतुलित उपयोग करने को कहा गया है। विभाग ने विशेष रूप से सिंगल सुपर फॉस्फेट के उपयोग को बेहतर बताते हुए इससे उत्पादन व गुणवत्ता में वृद्धि की बात कही है। यूरिया की कुल मात्रा 80 किलोग्राम प्रति बीघा निर्धारित की गई है, जिसे अलग-अलग चरणों में देना चाहिए। वहीं वैकल्पिक विधि के तहत यूरिया को चार भागों में बांटकर देने से 25 प्रतिशत तक बचत संभव है और फसल की वृद्धि भी बेहतर होती है। खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के समय पेंडिमेथिलीन का छिड़काव करने तथा जरूरत पड़ने पर बाद में अन्य खरपतवारनाशी उपयोग करने की सलाह दी गई है। साथ ही जिंक की कमी होने पर जिंक सल्फेट के उपयोग की भी सिफारिश की गई है। संयुक्त निदेशक कृषि डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि बीटी कपास में कीट एवं रोग नियंत्रण, विशेषकर गुलाबी सुंडी से बचाव के लिए समय-समय पर अलग से एडवाइजरी जारी की जाएगी। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर फसल उत्पादन बढ़ाएं और लागत कम करें।
