– बीपीएल भूमिहीन राजेन्द्र चमार बोले-‘हमारे लिए तीन हजार रुपये मामूली नहीं, अधिकारियों को इसलिए लगता है क्योंकि उनकी तनख्वाह लाखों में है’; जंतर-मंतर जाने और व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई की कही बात
हनुमानगढ़। टिब्बी तहसील के गांव सालीवाला निवासी बीपीएल भूमिहीन राजेन्द्र चमार मंगलवार को लगातार दूसरी बार अपनी समस्या लेकर जिला प्रशासन के पास पहुंचे। हाथ में तीन हजार रुपये का बिजली बिल और मन में लंबे समय से चली आ रही उपेक्षा का दर्द लिए राजेन्द्र ने प्रशासन के सामने अपनी पीड़ा रखी। उनका कहना था कि परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह हर माह तीन-तीन हजार रुपये का बिजली बिल चुका सके। पिछले माह भी उन्होंने करीब तीन हजार रुपये का बिल भरा था और इस बार फिर लगभग इतनी ही राशि का बिल आ गया। उनका दावा है कि इतनी खपत उनके परिवार की है ही नहीं।

राजेन्द्र चमार ने बताया कि वह बीपीएल परिवार से हैं और भूमिहीन हैं। घर-परिवार चलाने के लिए उन्हें दूसरों के घरों में काम करना पड़ता है। इसी मेहनत से किसी तरह बच्चों का पालन-पोषण करते हैं। ऐसे में तीन हजार रुपये का बिजली बिल उनके लिए छोटी रकम नहीं, बल्कि परिवार के पूरे बजट को हिला देने वाला खर्च है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में वह पहले भी जिला कलक्टर को प्रार्थना पत्र दे चुके हैं, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ। मंगलवार को वह दोबारा जिला प्रशासन के पास अपनी फरियाद लेकर पहुंचे।

‘अधिकारियों के लिए तीन हजार मामूली, हमारे लिए बच्चों के भोजन का सवाल’
राजेन्द्र के अनुसार, प्रशासनिक अधिकारी ने उनसे कहा कि तीन हजार रुपये का बिजली बिल अधिक नहीं है और सभी लोग दे रहे हैं। इस पर उन्होंने सवाल उठाया कि जब किसान को बिजली पर हजारों रुपये का अनुदान मिल रहा है और उसके खेत में दिनभर बिजली चलती है, तो उनके जैसे गरीब परिवार के घर में इतनी कम खपत के बावजूद इतना बिल क्यों आ रहा है। उन्होंने कहा कि उनके घर पर लगे मीटर की खपत इतनी नहीं है कि हर महीने तीन हजार रुपये का बिल आए। उन्होंने कहा कि अधिकारियों के लिए तीन हजार रुपये शायद मामूली रकम हो सकती है, क्योंकि उनकी तनख्वाह लाखों रुपये में है, लेकिन गरीब मजदूर परिवार के लिए तीन हजार रुपये जुटाना बेहद मुश्किल है। उनका कहना था कि वे किसी तरह मजदूरी और घरेलू काम करके पैसा जुटाते हैं और उसी से घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई तथा भोजन चलता है। ऐसे में लगातार भारी बिजली बिल उनकी परेशानी और बढ़ा रहा है।

‘26 जनवरी 1950 से हमारी जिंदगी में सब कुछ काला हो गया’
बात बिजली बिल से आगे बढ़ी तो राजेन्द्र चमार ने संविधान और आरक्षण व्यवस्था को लेकर भी तीखे सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब से संविधान लागू हुआ और 26 जनवरी 1950 आई, तब से उनकी जिंदगी में ऐसा ‘काला दिन’ आया कि उनके अनुसार सब कुछ काला हो गया। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें आज भी किसी तरह की वास्तविक राहत नहीं मिल रही है। उन्होंने आरक्षण व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनके सामने सबसे बड़ी समस्या इसी व्यवस्था को लेकर है। उनका आरोप था कि आरक्षण के कारण उच्च पदों पर बैठे कई लोगों को व्यवस्था और गरीबों की वास्तविक समस्याओं का ज्ञान नहीं है, जबकि पढ़े-लिखे युवाओं को रोजगार के लिए बाहर धक्के खाने पड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह संविधान में आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज उठाना चाहते हैं।

‘जंतर-मंतर जाकर उठाएंगे आवाज’
राजेन्द्र ने कहा कि वह अपनी समस्या और आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर जाना चाहते थे। उन्होंने कहा कि अब तक उन्होंने बहुत कुछ सहन किया है, लेकिन अब वे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना चाहते हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि अब तक ‘बलिदान देना सीखा था, अब बलिदान लेना सीखेंगे।’ उनके इस बयान को उन्होंने व्यवस्था के खिलाफ अपनी नाराजगी और संघर्ष की चेतावनी के रूप में रखा।
सरकार पर लगाया गरीबों की अनदेखी का आरोप
राजेन्द्र चमार ने राज्य की भजनलाल सरकार पर भी गरीबों की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार ने गरीब परिवारों के लिए ऐसा कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया, जिससे उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान हो सके। उनका आरोप था कि सरकार गरीबों के मुद्दों को गंभीरता से लेने के बजाय केवल घोषणाओं और दिखावे तक सीमित है। राजेन्द्र ने कहा कि उनकी मांग केवल अपने बिजली बिल की जांच और उचित राहत तक सीमित नहीं है, बल्कि वह चाहते हैं कि प्रशासन गरीब और भूमिहीन परिवारों की वास्तविक आर्थिक स्थिति को समझे। उन्होंने मांग की कि उनके बिजली मीटर और बिल की जांच कराई जाए तथा यदि बिल में किसी तरह की गड़बड़ी है तो उसे तत्काल दुरुस्त किया जाए। साथ ही उन्होंने गरीब परिवारों के लिए बिजली बिल में राहत की व्यवस्था करने की मांग भी उठाई।
