रावतसर। बैंक द्वारा बिना पूर्व सूचना के खाते को फ्रीज किए जाने के मामले में न्यायिक हस्तक्षेप के बाद परिवादी को बड़ी राहत मिली है। माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए बैंक की कार्रवाई पर नाराज़गी जताई और खाते को तत्काल प्रभाव से अनफ्रीज करने के आदेश दिए। जानकारी के अनुसार रावतसर निवासी मुकेश कुमार के बैंक खाते में 1116 रुपये की राशि किसी अन्य व्यक्ति द्वारा जमा करवाई गई थी, जो वास्तव में स्वयं मुकेश कुमार की ही राशि थी। इसी लेन-देन को संदिग्ध मानते हुए बैंक ने बिना किसी पूर्व सूचना के उनका खाता फ्रीज कर दिया। इस कार्रवाई से उन्हें मानसिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। मुकेश कुमार को खाते के फ्रीज होने की जानकारी उस समय मिली जब वे एचडीएफसी बैंक की शाखा में अपनी जमा राशि निकालने पहुंचे। बैंक अधिकारियों ने उन्हें बताया कि उनका खाता साइबर क्राइम के निर्देश पर फ्रीज किया गया है। अचानक खाते के बंद हो जाने से उनकी पारिवारिक और आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो गईं। इसके बाद मुकेश कुमार ने अधिवक्ता निर्मल माहेश्वरी से संपर्क किया। अधिवक्ता ने मामले को विधिसम्मत तरीके से राजस्थान उच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया। सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया कि खाता धारक के खिलाफ कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं है और न ही उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। इसके बावजूद खाते को फ्रीज करना नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने बैंक की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जांच के नाम पर निर्दोष नागरिकों के मौलिक और आर्थिक अधिकारों का अकारण हनन स्वीकार्य नहीं है। न्यायालय ने बैंक की कार्रवाई को अनुचित ठहराते हुए खाते को तत्काल प्रभाव से अनफ्रीज करने के आदेश दिए। आदेश की पालना में मुकेश कुमार का बैंक खाता फिर से चालू कर दिया गया, जिससे उन्हें राहत मिली। यह फैसला न केवल परिवादी के लिए न्याय साबित हुआ, बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। अदालत के इस निर्णय से स्पष्ट संदेश गया है कि जांच एजेंसियां और बैंक किसी भी नागरिक के अधिकारों को मनमाने तरीके से सीमित नहीं कर सकते।
संवाददाता- नरेश सिगची
