श्रीगंगानगर/हनुमानगढ़। पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और किसानों की आर्थिक मजबूती को ध्यान में रखते हुए जिले में मिनी बायोगैस प्लांट स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। केंद्र सरकार की कार्बन क्रेडिट योजना के तहत लगभग 50,500 रुपये लागत वाले मिनी बायोगैस प्लांट को अनुदान के बाद मात्र 15,500 रुपये में उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ किसानों की आय बढ़ाने का मार्ग भी प्रशस्त होगा। श्रीगंगानगर जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड ने इस योजना को और अधिक लाभकारी बनाने के लिए अपने स्तर पर अतिरिक्त अनुदान देने की पहल की है। संघ के इस सहयोग के बाद दुग्ध उत्पादक सदस्यों के घरों में मिनी बायोगैस प्लांट मात्र 10,500 रुपये में स्थापित करवाए जा रहे हैं। यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को भी प्रोत्साहित करेगी। सहकारी संघ ने योजना के प्रथम चरण में एक हजार दुग्ध उत्पादकों के घरों में मिनी बायोगैस प्लांट स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिए इच्छुक दुग्ध उत्पादकों को एक साधारण आवेदन पत्र भरकर हनुमानगढ़ जंक्शन के औद्योगिक क्षेत्र स्थित संघ कार्यालय में जमा करवाना होगा। संघ के अधिकारियों का कहना है कि योजना के प्रति ग्रामीणों में लगातार रुचि बढ़ रही है और आने वाले समय में इसका दायरा और अधिक विस्तारित किया जाएगा। मिनी बायोगैस संयंत्र की विशेषता यह है कि इससे घरेलू स्तर पर स्वच्छ और सस्ता ईंधन उपलब्ध होता है। इस संयंत्र से प्रतिमाह लगभग 20 किलोग्राम गैस का उत्पादन होता है, जिसका उपयोग खाना पकाने सहित अन्य घरेलू कार्यों में किया जा सकता है। इससे एलपीजी सिलेंडर पर होने वाला खर्च कम होता है और ग्रामीण परिवारों को नियमित गैस आपूर्ति की सुविधा मिलती है। बायोगैस संयंत्र का एक अन्य महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इससे उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद भी प्राप्त होती है। संयंत्र से निकलने वाली स्लरी साधारण गोबर की खाद की तुलना में अधिक पौष्टिक होती है, क्योंकि इसमें नाइट्रोजन और फास्फोरस जैसे पोषक तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।

यह खाद खेतों की मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक होती है और फसलों की पैदावार में भी वृद्धि करती है। इसके अलावा बायोगैस संयंत्र की पाचन प्रक्रिया के दौरान गोबर में मौजूद खरपतवार के बीज नष्ट हो जाते हैं, जिससे खेतों में अनावश्यक घास उगने की समस्या भी कम हो जाती है। पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी बायोगैस संयंत्र अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरागत चूल्हों से निकलने वाले धुएं से महिलाओं और बच्चों को आंखों तथा सांस संबंधी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। बायोगैस के उपयोग से यह समस्या काफी हद तक कम हो जाती है, क्योंकि यह धुआं रहित और स्वच्छ ईंधन है। इससे ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार होने के साथ-साथ घरेलू वातावरण भी स्वच्छ बनता है। इसके अलावा बायोगैस संयंत्र मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने में भी सहायक है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद मिलती है। गोबर और जैविक कचरे का सही तरीके से उपयोग होने से आसपास गंदगी कम होती है तथा मक्खी-मच्छरों की समस्या भी घटती है। इससे गांवों में स्वच्छता बनाए रखने में भी सहायता मिलती है। विशेषज्ञों के अनुसार बायोगैस संयंत्र के उपयोग से लकड़ी की आवश्यकता भी कम हो जाती है, जिससे पेड़ों की कटाई पर रोक लगाने में मदद मिलती है। इस प्रकार यह योजना पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक प्रभावी माध्यम बनकर उभर रही है। जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ ने जिलेवासियों से अपील की है कि वे इस योजना का अधिक से अधिक लाभ उठाएं और अपने घरों में मिनी बायोगैस प्लांट स्थापित कर हरित ऊर्जा को बढ़ावा दें। कार्बन क्रेडिट योजना की सुविधा का लाभ सभी जिलेवासी उठा सकते हैं। अधिकाधिक संख्या में बायोगैस संयंत्र स्थापित होने से न केवल पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि होगी और ग्रामीण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा। सरकार और सहकारी संस्थाओं की इस संयुक्त पहल से उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में जिले के अधिक से अधिक किसान इस योजना से जुड़ेंगे और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक नई मिसाल स्थापित करेंगे।
