हनुमानगढ़। जिले में हाल ही में हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने रबी फसलों को भारी नुकसान पहुंचाया है। प्राकृतिक आपदा की मार झेलने के बाद जैसे ही मौसम साफ हुआ, किसानों ने राहत की उम्मीद के साथ गेहूं की कटाई शुरू की और अपनी उपज लेकर मंडियों की ओर रुख किया। लेकिन मंडियों में लागू नई व्यवस्थाओं के कारण किसानों को अपनी फसल बेचने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इस स्थिति को लेकर किसान संगठनों में रोष बढ़ता जा रहा है। इसी क्रम में सीटू नेता शेरसिंह शाक्य ने सरकार की खरीद व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि बायोमेट्रिक और स्लॉट बुकिंग प्रणाली के कारण गेहूं की सरकारी खरीद सुचारू रूप से संभव नहीं हो पा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा गेहूं विक्रय पर इतनी बाध्यताएं लागू कर दी गई हैं कि किसान परेशान हो गए हैं। ‘ऐसा प्रतीत होता है कि हनुमानगढ़ के किसान ने गेहूं बेचकर कोई गलती कर दी है, उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा।

शाक्य ने कहा कि गेहूं किसी फैक्ट्री में तैयार होने वाला उत्पाद नहीं है, बल्कि यह किसानों की मेहनत और प्रकृति पर निर्भर फसल है, जो पूरे देश की खाद्य व्यवस्था की रीढ़ है। इसके बावजूद सरकार की नीतियां किसानों के हित में नहीं दिख रही हैं। उन्होंने कहा कि भले ही कागजों में मार्च माह से गेहूं की सरकारी खरीद शुरू बताई जा रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अब तक बहुत ही कम मात्रा में एमएसपी पर खरीद हो पाई है। उन्होंने आगे कहा कि प्रदेश के कई जिलों में खरीद व्यवस्था ठप पड़ी है। कोटा और बाड़मेर में खरीद बंद जैसी स्थिति है, जबकि पड़ोसी जिले श्रीगंगानगर, जिसे धान का कटोरा कहा जाता है, वहां की मंडियों में भी ताले लगे हुए हैं। हनुमानगढ़ में भी किसानों और मजदूरों की समस्याओं को लेकर किसान सभा और सीटू की बैठक प्रस्तावित है, जिसमें आगामी आंदोलन की रणनीति तैयार की जाएगी। मजदूरों की समस्याओं पर भी शाक्य ने चिंता व्यक्त की।

उन्होंने बताया कि मंडियों में हजारों की संख्या में मजदूर कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनके लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। शौचालय, पेयजल और विश्राम के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। आगामी दिनों में भीषण गर्मी पड़ने वाली है, ऐसे में मजदूरों के लिए विश्राम गृह की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है, लेकिन प्रशासन इस ओर ध्यान नहीं दे रहा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मंडियों में बने शेड जर्जर हालत में हैं। हल्की हवा चलने पर ही शेड उड़ जाते हैं और अधिकांश शेडों से पानी टपकता है, जिससे अनाज को भी नुकसान होने का खतरा बना रहता है। जबकि दूसरी ओर सरकार मंडियों के विकास के लिए करोड़ों रुपए के बजट जारी करने का दावा कर रही है। अंत में शाक्य ने मांग की कि बायोमेट्रिक सिस्टम और स्लॉट बुकिंग जैसी जटिल व्यवस्थाओं को तुरंत समाप्त कर पुरानी पद्धति से फसलों की खरीद शुरू की जाए, ताकि प्राकृतिक आपदा से प्रभावित किसानों को राहत मिल सके और वे अपनी उपज का उचित मूल्य प्राप्त कर सकें।
