जयपुर। राजस्थान में लंबे समय से लंबित नगरीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने कहा कि राज्य सरकार ने चुनाव से जुड़ी सभी प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी कर ली हैं। अब चुनाव कार्यक्रम घोषित करना राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आयोग की संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर है। मंत्री ने कहा कि सरकार ने मार्च 2026 में ही परिसीमन और पुनर्सीमांकन का कार्य पूरा कर लिया था और सरकार के स्तर पर अब कोई प्रक्रिया लंबित नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुसार निकाय और पंचायत चुनाव कराने का अधिकार राज्य निर्वाचन आयोग के पास है, जबकि ओबीसी राजनीतिक आरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया पूरी करना राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की जिम्मेदारी है। खर्रा ने बताया कि ट्रिपल टेस्ट के तहत ओबीसी आबादी, स्थानीय निकायों में उनके प्रतिनिधित्व और सामाजिक स्थिति का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। आयोग इसी आधार पर अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक आवश्यकता है, ताकि भविष्य में चुनाव किसी कानूनी विवाद में न फंसे। मंत्री के अनुसार, स्थानीय स्तर से प्राप्त आंकड़ों के सत्यापन के दौरान कई विसंगतियां सामने आईं। राज्य निर्वाचन आयोग के फील्ड वेरिफिकेशन में कई जानकारियां वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाईं, जिसके कारण अंतिम रिपोर्ट तैयार होने में अपेक्षा से अधिक समय लगा। उन्होंने कहा कि आयोग को जल्द से जल्द सत्यापन पूरा कर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने चुनाव में देरी का एक कारण मानव संसाधनों की कमी भी बताया। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), सर्वेक्षण और अन्य प्रशासनिक कार्य एक साथ चलने से कर्मचारियों की उपलब्धता प्रभावित हुई, जिससे रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया धीमी रही। इस बीच राजस्थान हाईकोर्ट ने 31 जुलाई तक निकाय और पंचायत चुनाव कराने के निर्देश दिए हैं। चुनाव कार्यक्रम घोषित नहीं होने पर कांग्रेस नेता संयम लोढ़ा ने अवमानना याचिका दायर की है, जिसमें राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकारियों को पक्षकार बनाया गया है। विपक्ष पर निशाना साधते हुए झाबर सिंह खर्रा ने कहा कि कांग्रेस दोहरी नीति अपना रही है। एक ओर वह चुनाव में देरी का आरोप लगा रही है, वहीं दूसरी ओर ओबीसी राजनीतिक आरक्षण भी बनाए रखना चाहती है। उन्होंने दावा किया कि बजट सत्र के दौरान सरकार ने विपक्ष से कहा था कि यदि वह ओबीसी आरक्षण के बिना चुनाव कराने पर सहमत है तो लिखित प्रस्ताव दे, लेकिन ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं दिया गया। मंत्री ने यह भी कहा कि ओबीसी आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला 2022-23 में आया था, जब राज्य में कांग्रेस की सरकार थी। यदि कांग्रेस गंभीर होती तो उसी समय राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कर ट्रिपल टेस्ट की प्रक्रिया शुरू कर सकती थी। उन्होंने दावा किया कि भाजपा सरकार बनने के बाद इस विषय को प्राथमिकता देते हुए आयोग का गठन किया गया और आवश्यक कार्रवाई शुरू कराई गई। खर्रा ने कहा कि जैसे ही राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अपनी अंतिम रिपोर्ट राज्य निर्वाचन आयोग को सौंपेगा, ओबीसी राजनीतिक आरक्षण पर निर्णय लिया जाएगा और उसके बाद निकाय एवं पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
