जयपुर। सुप्रीम कोर्ट ने निलंबित राजस्थान प्रशासनिक सेवा अधिकारी हनुमानाराम विरड़ा की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पष्ट किया कि इस स्तर पर आरोपी को राहत नहीं दी जा सकती। यह फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने बुधवार को सुनवाई के दौरान सुनाया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कड़ा रुख अपनाते हुए कहा गया कि आरोपी का आचरण न केवल आपराधिक है, बल्कि यह लोक प्रशासन की बुनियादी संरचना और प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता पर सीधा हमला है। सरकार ने तर्क दिया कि यदि इस तरह का व्यक्ति प्रशासनिक सेवा में बना रहता, तो यह पूरे राज्य व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकता था। यहां तक कहा गया कि ऐसा अधिकारी राज्य के हितों को भी नुकसान पहुंचा सकता था। मामले के अनुसार, हनुमानाराम विरड़ा पर आरोप है कि उसने सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा-2021 और पटवारी भर्ती परीक्षा-2021 के विभिन्न चरणों में ‘डमी कैंडिडेट’ बनकर अन्य अभ्यर्थियों की जगह परीक्षा दी। यह आरोप एक संगठित परीक्षा रैकेट की ओर इशारा करते हैं, जिसमें आरोपी की सक्रिय भूमिका बताई गई है। सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल एस.डी. संजय और अतिरिक्त महाधिवक्ता शिवमंगल शर्मा ने कोर्ट को बताया कि आरोपी एक मेधावी छात्र रहा है, जिसने राजस्थान प्रशासनिक सेवा परीक्षा-2021 में 22वीं रैंक हासिल की थी, साथ ही पूर्व में भी अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में उच्च स्थान प्राप्त किया था। बावजूद इसके, उस पर गंभीर आरोप हैं कि उसने अपनी योग्यता का दुरुपयोग करते हुए अवैध गतिविधियों में भाग लिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी के खिलाफ आरोप केवल एक बार की घटना तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह उसके लगातार आपराधिक आचरण को दर्शाते हैं। कोर्ट ने यह भी माना कि प्रारंभिक एफआईआर में आरोपी का नाम नहीं था, लेकिन जांच के दौरान उसकी संलिप्तता सामने आई, जो इस पूरे मामले में उसकी गहरी भूमिका को दर्शाती है।
गौरतलब है कि बाड़मेर जिले के बिसारणियां गांव निवासी हनुमानाराम विरड़ा को 9 अप्रैल 2025 को गिरफ्तार किया गया था। जांच एजेंसियों के अनुसार, वह तीन अलग-अलग अभ्यर्थियों के लिए डमी उम्मीदवार के रूप में परीक्षा में शामिल हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता बनाए रखने और संगठित नकल व फर्जीवाड़े पर सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि इस तरह के मामलों में सख्ती बरती जाएगी और दोषियों को किसी भी प्रकार की राहत आसानी से नहीं मिलेगी।
