चारणवासी। हरियाणा सीमा से सटे गांवों में गेहूं कटाई के दौरान कंबाइन मशीनों के बढ़ते उपयोग ने जहां किसानों को समय की बचत का विकल्प दिया है, वहीं इससे तूड़ी (चारा) की कमी और खेतिहर मजदूरों के सामने रोजगार संकट गहराता जा रहा है। पिछले चार-पांच वर्षों में मशीनीकरण के तेज़ी से बढ़ने का असर अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। वर्तमान समय में पंजाब और हरियाणा से आई करीब दो दर्जन कंबाइन मशीनें क्षेत्र के खेतों में गेहूं व जौ की कटाई में लगी हुई हैं। कंबाइन से कटाई के कारण इस सीजन में ही तूड़ी के दाम 400 से 450 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं। किसान रामकुमार और पतराम के अनुसार, कंबाइन से कटाई में समय की बचत तो होती है, लेकिन इससे तूड़ी की पैदावार कम हो जाती है। उन्होंने बताया कि कंबाइन से कटाई के बाद प्रति बीघा केवल 7-8 क्विंटल तूड़ी मिलती है, जबकि रीपर या मजदूरों से कटाई कर थ्रेसर से निकालने पर 10-12 क्विंटल तक तूड़ी प्राप्त होती है। यही वजह है कि कई किसान अपने पशुओं के लिए सालभर का चारा सुरक्षित रखने हेतु अभी भी रीपर का सहारा ले रहे हैं। इस बदलाव का सबसे अधिक असर भूमिहीन मजदूरों और पशुपालन पर निर्भर परिवारों पर पड़ा है। श्रमिक बनवारी लाल और संदीप ने बताया कि पहले वे कटाई से लेकर थ्रेसर और तूड़ी भंडारण तक का काम ठेके पर करते थे, जिससे उन्हें सालभर के लिए अनाज और पशुओं के लिए पर्याप्त चारा मिल जाता था। इसके अलावा संपन्न किसान अतिरिक्त रूप से तूड़ी भी दे दिया करते थे, लेकिन अब कंबाइन के कारण यह व्यवस्था पूरी तरह समाप्त हो गई है। पशुपालक ओमप्रकाश का कहना है कि मशीनों ने काम तो आसान कर दिया है, लेकिन चारे का संतुलन बिगाड़ दिया है। वहीं, मजदूरों की कमी के चलते छोटे किसान भी अब मजबूरी में कंबाइन का सहारा लेने लगे हैं, जिससे भविष्य में चारे का संकट और गहराने की आशंका जताई जा रही है। कुल मिलाकर, मशीनीकरण ने जहां बड़े किसानों को सुविधा दी है, वहीं इससे ग्रामीण मजदूरों के रोजगार और पशुपालकों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।
संवाददाता-जयलाल वर्मा
