हनुमानगढ़। जोधपुर डिस्कॉम के प्रस्तावित निजीकरण को लेकर विरोध तेज हो गया है। प्रस्तावित निजीकरण को निरस्त करने तथा आरडीएसएस (रिवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम) के तहत स्वीकृत 6000 करोड़ रुपए की राशि के संरक्षण को लेकर जोधपुर डिस्कॉम संयुक्त संघर्ष समिति की ओर से बुधवार को मुख्यमंत्री को मांग पत्र प्रेषित किया गया। ज्ञापन में समिति ने कहा है कि निजीकरण की प्रक्रिया से प्रदेश के विद्युत कर्मचारियों, अधिकारियों एवं उपभोक्ताओं में गहरा असंतोष व्याप्त है। समिति ने इसे जनहित एवं राज्य हित के विरुद्ध बताया है। समिति ने अपने ज्ञापन में ओडिशा में हुए विद्युत निजीकरण के अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां निजी कंपनियां आपदा के समय जिम्मेदारी निभाने में विफल रहीं, जिसके बाद व्यवस्था पुन: सरकारी नियंत्रण में लेनी पड़ी। इसके अलावा राजस्थान के कोटा, बीकानेर और भरतपुर में फ्रेंचाइजी मॉडल के अनुभवों का हवाला देते हुए कहा गया कि निजी कंपनियों ने समझौतों की शर्तांे का पालन नहीं किया, जिससे उपभोक्ता सेवा प्रभावित हुई और कर्मचारियों पर भी प्रतिकूल असर पड़ा। ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि जोधपुर डिस्कॉम का घाटा कर्मचारियों की नहीं बल्कि नीतिगत कमियों और आउटसोर्सिंग व्यवस्था का परिणाम है। साथ ही कर्मचारियों के प्रयासों से एटीएंडसी हानि में सुधार भी हुआ है। समिति ने यह भी तर्क दिया कि केन्द्र सरकार की ओर से स्वीकृत 6000 करोड़ रुपए की आरडीएसएस राशि का उपयोग केवल सरकारी निगम के सुदृढ़ीकरण के लिए किया जाना चाहिए, न कि निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए। संयुक्त संघर्ष समिति ने मांग की है कि जोधपुर डिस्कॉम के निजीकरण के प्रस्ताव को तत्काल निरस्त किया जाए, ठेका प्रथा को समाप्त कर नियमित नियुक्तियां की जाएं तथा फ्रेंचाइजी मॉडल की विफलताओं की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। समिति ने चेतावनी दी है कि यदि मांगों पर विचार नहीं किया गया तो प्रदेशव्यापी आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और अन्य लोकतांत्रिक विरोध कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे। इस मौके पर आत्माराम, पंकज श्योराण, विनोद अग्रवाल, शैलेन्द्र महला इत्यादि मौजूद रहे।
