– हनुमानगढ़ के लखासर निवासी को मिला ‘सस्टेनेबिलिटी चैंपियन-पावर ऑफ वन’ अवार्ड, जीव रक्षा के लिए निजी संसाधनों से चला रहे अभियान
हनुमानगढ़। वन्यजीव संरक्षण, जीवदया और पर्यावरण रक्षा के क्षेत्र में साढ़े तीन दशक से अधिक समय तक निःस्वार्थ सेवा करने वाले हनुमानगढ़ जिले के लखासर गांव निवासी अनिल कुमार बिश्नोई को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है। पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें द्वितीय बीएसजी अवार्ड्स फॉर एक्सीलेंस इन सस्टेनेबिलिटी के अंतर्गत प्रतिष्ठित ‘सस्टेनेबिलिटी चैंपियन–पावर ऑफ वन’ अवार्ड से नवाजा गया। मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के लोधी रोड स्थित चिन्मय मिशन ऑडिटोरियम में आयोजित समारोह में अनिल बिश्नोई की दशकों की सेवा और जमीनी स्तर पर किए गए संरक्षण कार्यों को राष्ट्रीय पहचान मिली। काले हिरण (कृष्णमृग), चिंकारा सहित अन्य वन्यजीवों की रक्षा के लिए उनका समर्पण पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभरा है।
1700 से अधिक घायल और अनाथ हिरणों की देखभाल
अनिल बिश्नोई पिछले 35 वर्षों से अधिक समय से वन्यजीव संरक्षण, जीवदया और मानव-वन्यजीव सहअस्तित्व के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं। वे घायल और अनाथ हिरणों का उपचार करने, उनका पालन-पोषण करने तथा स्वस्थ होने पर उन्हें प्राकृतिक आवास में छोड़ने का कार्य करते हैं। उनके प्रयासों से अब तक 1700 से अधिक घायल एवं अनाथ हिरणों की देखभाल और पुनर्वास किया जा चुका है। इसके अलावा हजारों वन्यजीवों की सुरक्षा में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
निजी संसाधनों से जारी रखा जीव रक्षा अभियान
सीमित आर्थिक संसाधनों के बावजूद अनिल बिश्नोई ने जीव रक्षा के अपने अभियान को निरंतर जारी रखा। वे निजी साधनों के साथ ग्रामीणों के सहयोग और स्थानीय युवाओं की भागीदारी से वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए प्रयासरत हैं। घायल वन्यजीवों के उपचार से लेकर अवैध शिकार की सूचना मिलने पर मौके पर पहुंचने और संबंधित विभागों के साथ समन्वय करने तक वे सक्रिय भूमिका निभाते हैं। वन्यजीवों के प्रति क्रूरता और शिकार से जुड़े मामलों में उन्होंने 300 से अधिक कानूनी कार्रवाइयों में पहल अथवा सहयोग किया है।
60 से अधिक जलकुंडों और जलाशयों की व्यवस्था में योगदान
राजस्थान के गर्म एवं शुष्क क्षेत्रों में वन्यजीवों के लिए पेयजल उपलब्ध कराना भी उनके संरक्षण अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस दिशा में उन्होंने ग्रामीणों के सहयोग से 60 से अधिक जलकुंडों एवं जलाशयों की व्यवस्था में योगदान दिया। उनका अभियान अनेक गांवों तक पहुंचा है, जहां वे ग्रामीणों और युवाओं को वन्यजीवों की रक्षा के लिए प्रेरित करते हैं। अनिल बिश्नोई जीवदया, अहिंसा और करुणा को भारतीय संस्कृति तथा बिश्नोई परंपरा की मूल भावना मानते हैं। उनका मानना है कि वन्यजीव संरक्षण केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक दायित्व है। इसी सोच के साथ वे मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष कम करने तथा सहअस्तित्व की भावना विकसित करने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं।
देशभर से आए नामांकनों में जमीनी प्रयासों को मिली पहचान
आयोजकों के अनुसार, पुरस्कार के लिए देशभर से प्राप्त नामांकनों का निर्णायक मंडल ने कई चरणों में मूल्यांकन किया। इस दौरान कार्यों के प्रभाव, नवाचार और व्यापक स्तर पर उनके विस्तार की संभावनाओं को आधार बनाया गया। मूल्यांकन प्रक्रिया में अनिल बिश्नोई के जमीनी प्रयासों को विशिष्ट पहचान मिली। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में एडवर्ब टेक्नोलॉजीज लिमिटेड के चेयरमैन जलज अश्विन दानी तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में कारो संभव के संस्थापक प्रांशु सिंघल आमंत्रित थे। निर्णायक मंडल में डॉ. रूबी मखीजा, गौरव शाह, रिपुदमन सिंह बेवली, विकास वर्मा, डॉ. प्रणब जे. पातर और डॉ. अदिति हलदर सहित पर्यावरण एवं सतत विकास क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल थे।
पहले भी मिल चुके हैं प्रतिष्ठित सम्मान
अनिल बिश्नोई को इससे पहले वर्ष 2009 में राजस्थान का अमृता देवी विश्नोई पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार तथा वर्ष 2021 में नेटवेस्ट ग्रुप इंडिया अर्थ हीरो अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। अब ‘सस्टेनेबिलिटी चैंपियन–पावर ऑफ वन’ अवार्ड उनके लंबे संघर्ष, जीवों के प्रति करुणा और ग्रामीण स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों को मिली एक और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पहचान है।
