– 30-32 साल से दीपक बनाने में जुटे इन्द्राज प्रजापत, छह माह की मेहनत के बाद तैयार होता है माल; बोले- परंपरागत काम की अपनी पहचान
हनुमानगढ़। दीपावली पर घर-आंगन को रोशन करने वाले मिट्टी के दीपक सिर्फ रोशनी का माध्यम नहीं, बल्कि कुम्हार समाज की वर्षों पुरानी परंपरा और मेहनत की पहचान भी हैं। बाजार में चाइनीज आइटमों की मौजूदगी के बावजूद मिट्टी के दीपकों की मांग बढ़ना पारंपरिक कारीगरों के लिए राहत की बात है। हनुमानगढ़ जंक्शन की भट्ठा कॉलोनी, वार्ड 12 निवासी इन्द्राज प्रजापत पिछले करीब 30-32 वर्षों से मिट्टी के दीपक बनाने के कार्य में जुटे हैं। इस बार दीपावली पर उनके पास करीब डेढ़ लाख दीपक तैयार करने का ऑर्डर आया है, जिनमें से अब तक करीब सवा लाख दीपक तैयार किए जा चुके हैं। इन्द्राज प्रजापत ने बताया कि केन्द्र और राज्य सरकार की ओर से कारीगरों को चाक, मिट्टी गूंथने की मशीन सहित अन्य सुविधाओं का लाभ दिया गया है। विश्वकर्मा योजना के तहत ऋण की सुविधा भी उपलब्ध है। उन्होंने इसे कुम्हार एवं प्रजापत समाज के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की दिशा में सरकार की सराहनीय पहल बताया। हालांकि, उन्होंने चिंता जताई कि नई पीढ़ी इस पारंपरिक काम को अपनाने में रुचि नहीं दिखा रही है। ऐसे में पुराने कारीगरों पर ही काम का अधिक दबाव रहता है।
छह माह की तैयारी के बाद तैयार होता है दीपकों का माल
इन्द्राज प्रजापत ने बताया कि मिट्टी के दीपक तैयार करने का काम मार्च-अप्रेल से शुरू हो जाता है और इसकी तैयारी में करीब छह माह का समय लग जाता है। सबसे पहले दूर-दराज से मिट्टी की व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके बाद मिट्टी को सुखाया जाता है और उसकी कुटाई की जाती है। फिर मिट्टी को भिगोकर गूंथा जाता है। चाक पर चढ़ाने से पहले मिट्टी को सात-आठ बार अलग-अलग प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।

इसके बाद दीपक तैयार किए जाते हैं। दीपक तैयार होने के बाद उन्हें सुखाया जाता है और उन पर रंग किया जाता है। फिर इन्हें भट्टी में पकाने के लिए रखा जाता है। दीपकों को पूरी तरह पकने में करीब 40 घंटे का समय लग जाता है। इस लंबी प्रक्रिया के बाद तैयार माल बाजार में बिक्री के लिए पहुंचता है। इसी मेहनत से उनके परिवार का जीवन-यापन चलता है।
पिछले साल के मुकाबले बढ़ी मिट्टी के दीपकों की मांग
इन्द्राज प्रजापत के अनुसार, इस बार दीपावली पर करीब डेढ़ लाख दीपक तैयार करने का ऑर्डर मिला है। अब तक लगभग सवा लाख दीपक बनाए जा चुके हैं। उन्होंने बताया कि पिछले साल के मुकाबले इस बार मिट्टी के दीपकों की मांग बढ़ी है। बाजार में चाइनीज आइटमों की मौजूदगी का उनके काम पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा है। इसके उलट, चाइनीज आइटमों के बहिष्कार से मिट्टी के दीपक बनाने के पारंपरिक काम को बढ़ावा मिला है। उन्होंने कहा कि परंपरागत काम की अपनी अलग पहचान होती है, जिसे आधुनिक वस्तुएं पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकतीं। ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए अब नए-नए डिजाइनों में भी मिट्टी के दीपक तैयार किए जा रहे हैं, ताकि लोगों को परंपरा के साथ नएपन का विकल्प भी मिल सके।
चाइनीज आइटम छोड़ें, मिट्टी के दीपक खरीदकर कारीगरों को दें सहारा
इन्द्राज प्रजापत ने आमजन से अपील की कि दीपावली पर चाइनीज आइटमों की जगह मिट्टी से बने दीपक खरीदें। इससे न केवल पारंपरिक संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि वर्षों से इस काम में जुटे कारीगरों को भी आर्थिक संबल मिलेगा। उन्होंने कहा कि मिट्टी के दीपक खरीदकर लोग कुम्हार एवं प्रजापत समाज के पारंपरिक व्यवसाय को जीवित रखने में अपना योगदान दे सकते हैं।
