लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक बड़ी आतंकी साजिश को समय रहते नाकाम कर दिया गया। यूपी एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड (एटीएस) ने गुरुवार को चार संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार किया है, जो शहर में विस्फोट और आगजनी की घटनाओं को अंजाम देकर दहशत फैलाने की योजना बना रहे थे। इस पूरे मामले का खुलासा शुक्रवार को एटीएस ने किया। एटीएस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान साकिब उर्फ डेविल, विकास गहलावत उर्फ रौनक, लोकेश उर्फ बाबू उर्फ पपला पंडित और अरबाब के रूप में हुई है। इनमें साकिब इस गिरोह का सरगना बताया जा रहा है। जांच में सामने आया है कि ये सभी आरोपी पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स के संपर्क में थे और उनके निर्देश पर भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की साजिश रच रहे थे। एटीएस ने आरोपियों के पास से केमिकल से भरा एक कैन, सात मोबाइल फोन, 24 पंपलेट और आधार कार्ड बरामद किए हैं। बरामद मोबाइल फोन की जांच में कई अहम डिजिटल सबूत मिले हैं, जिनके आधार पर एजेंसियां इस नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही हैं।
रेलवे स्टेशन और महत्वपूर्ण स्थान थे निशाने पर
एटीएस के मुताबिक, यह गिरोह लखनऊ रेलवे स्टेशन के पास स्थित रेलवे सिग्नल बॉक्स और अन्य महत्वपूर्ण संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की योजना बना रहा था। उनका मकसद 2 अप्रैल को एक बड़ा विस्फोट कर भारी जनहानि करना और शहर में दहशत का माहौल पैदा करना था। हालांकि एटीएस को पहले ही इस साजिश की जानकारी मिल गई और टीम ने समय रहते कार्रवाई करते हुए सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया।
मेरठ का रहने वाला है सरगना
जांच में पता चला है कि गिरोह का मुख्य आरोपी साकिब उर्फ डेविल मेरठ जिले के अगवानपुर गांव का रहने वाला है। वह पेशे से नाई का काम करता था, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स के संपर्क में आ गया। धीरे-धीरे वह इस नेटवर्क का सक्रिय सदस्य बन गया और अन्य लोगों को भी अपने साथ जोड़ने लगा।
साकिब ने अपने ही गांव के रहने वाले अरबाब को इस नेटवर्क में शामिल किया। इसके बाद उसने सोशल मीडिया के माध्यम से गौतमबुद्ध नगर के रहने वाले विकास गहलावत उर्फ रौनक और लोकेश को भी गिरोह का हिस्सा बना लिया।
सोशल मीडिया के जरिए जुड़ा आतंकी नेटवर्क
एटीएस की जांच में सामने आया है कि आरोपी टेलीग्राम, इंस्टाग्राम और सिग्नल जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए विदेशी नंबरों से जुड़े हुए थे। इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल सुरक्षित और गुप्त बातचीत के लिए किया जा रहा था। इसी माध्यम से पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स आरोपियों को निर्देश देते थे और उन्हें टारगेट की जानकारी उपलब्ध कराते थे। पाकिस्तानी हैंडलर्स आरोपियों को गूगल लोकेशन भेजते थे, जिसके आधार पर ये लोग मौके पर जाकर रेकी करते थे। वहां की पूरी जानकारी वीडियो बनाकर वापस भेजते थे, ताकि आगे की योजना तैयार की जा सके।
कई शहरों में की गई थी रेकी
जांच एजेंसियों के अनुसार गिरोह के सदस्य लखनऊ के अलावा गाजियाबाद, अलीगढ़ समेत कई शहरों में भीड़भाड़ वाले स्थानों, प्रतिष्ठित संस्थानों और रेलवे से जुड़ी संपत्तियों की रेकी कर चुके थे। उनका मकसद ऐसे स्थानों को निशाना बनाना था, जहां विस्फोट से अधिकतम नुकसान और दहशत फैलाई जा सके।
आगजनी कर भेजते थे वीडियो पूछताछ में यह भी खुलासा हुआ है कि गिरोह के सदस्य छोटी-छोटी आगजनी की घटनाओं को अंजाम देकर उसका वीडियो बनाते थे। इसके बाद यह वीडियो पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स को भेजा जाता था, ताकि उन्हें अपने काम का सबूत दिया जा सके। इन गतिविधियों के बदले में आरोपियों को क्यूआर कोड के माध्यम से पैसे भेजे जाते थे। इस तरह यह नेटवर्क आतंक फैलाने के साथ-साथ आर्थिक लाभ भी हासिल कर रहा था।
कट्टरपंथी विचारधारा से किया जा रहा था प्रभावित
जांच में यह भी सामने आया है कि पाकिस्तानी हैंडलर्स आरोपियों को कट्टरपंथी और आतंकी विचारधारा से प्रभावित करने का प्रयास कर रहे थे। टेलीग्राम और इंस्टाग्राम पर उन्हें ऐसे ग्रुप्स से जोड़ा गया था, जहां धर्म के नाम पर हिंसा और आगजनी के लिए उकसाया जाता था। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस नेटवर्क का मुख्य उद्देश्य भारत में भय और अस्थिरता का माहौल पैदा करना था, ताकि देश की आंतरिक शांति और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाया जा सके। फिलहाल एटीएस आरोपियों से गहन पूछताछ कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इस नेटवर्क से और कौन-कौन लोग जुड़े हुए हैं। साथ ही बरामद डिजिटल सबूतों के आधार पर पूरे नेटवर्क की कड़ियों को खंगाला जा रहा है।
