पश्चिम बंगाल के खूबसूरत पहाड़ी शहर दार्जिलिंग में इस वर्ष भी राजस्थान का प्रसिद्ध और पारंपरिक पर्व गणगौर बड़े उत्साह, श्रद्धा और सांस्कृतिक उल्लास के साथ मनाया गया। राजस्थान से दूर बसे राजस्थानी समाज की महिलाओं ने अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखते हुए पूरे विधि-विधान से माता गणगौर की पूजा-अर्चना की। कार्यक्रम में पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए महिलाओं ने भक्ति, आस्था और उत्साह के साथ इस पर्व को यादगार बना दिया। गणगौर पर्व के अवसर पर महिलाओं ने पारंपरिक राजस्थानी वेशभूषा धारण की, जिसमें रंग-बिरंगे घाघरा-चोली, ओढ़नी और पारंपरिक आभूषणों की विशेष झलक देखने को मिली। सजे-धजे वातावरण में माता गणगौर की प्रतिमा को विधिपूर्वक स्थापित कर पूजा-अर्चना की गई।

पूजा के दौरान महिलाओं ने पारंपरिक लोकगीत गाए और सामूहिक रूप से सांस्कृतिक उत्सव का आनंद लिया। पूरे कार्यक्रम में राजस्थानी संस्कृति की जीवंत झलक दिखाई दी और वातावरण भक्तिमय हो गया। इस अवसर पर उपस्थित महिलाओं ने बताया कि गणगौर पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो विशेष रूप से महिलाओं के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। विवाहित महिलाएं इस दिन अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित युवतियां अच्छे जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए माता गणगौर से प्रार्थना करती हैं।

यह पर्व नारी शक्ति, श्रद्धा और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक माना जाता है। दार्जिलिंग जैसे दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र में रहने के बावजूद राजस्थानी समाज की महिलाओं ने अपनी संस्कृति और परंपराओं को पूरी निष्ठा के साथ निभाया। कार्यक्रम के दौरान पारंपरिक गीतों और पूजा-विधि के माध्यम से राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने का सराहनीय प्रयास देखने को मिला। उपस्थित महिलाओं ने सामूहिक रूप से उत्सव में भाग लेकर एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक जुड़ाव का संदेश भी दिया। इस आयोजन में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी रही, जिससे कार्यक्रम का उत्साह और भी बढ़ गया।

कार्यक्रम में कृष्णा, बबीता, मीतू, प्रभा, कुसुम, बेला, अनीता, सिम्पल, सुशीला, जया, संगीता, अनीता, उमा सहित कई महिलाएं उपस्थित रहीं। सभी ने मिलकर इस पारंपरिक पर्व को भक्ति और उल्लास के साथ मनाया। दार्जिलिंग जैसे दूरस्थ और पहाड़ी क्षेत्र में भी राजस्थान की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और लोकआस्था को जीवित रखने का यह प्रयास समाज के लिए प्रेरणादायक माना जा रहा है। इस आयोजन ने यह संदेश भी दिया कि भौगोलिक दूरी चाहे जितनी भी हो, लेकिन अपनी जड़ों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ाव ही समाज को एक सूत्र में बांधे रखता है।
संवाददाता- आर. के. जोशी
