ऐलनाबाद। होलिका पर्व को शास्त्रसम्मत विधि से मनाने को लेकर नगर के विद्वानों ने आवश्यक समय निर्धारण कर दिया है। इस संबंध में आयोजित विद्वानों की बैठक में होलिका दहन के पंचांगानुसार शुभ मुहूर्त, भद्रा विचार और प्रदोष काल को लेकर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक में विद्वानों ने सर्वसम्मति से आमजन से शास्त्रोक्त समयावधि में ही होलिका दहन करने का आह्वान किया। बैठक को संबोधित करते हुए विद्वान प्रभु शास्त्री ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन फाल्गुन शुक्ल की प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा में, भद्रा रहित समय में करना उत्तम माना गया है। उन्होंने जानकारी दी कि इस वर्ष पूर्णिमा का आरंभ 2 मार्च को शाम 5:56 बजे होगा, जो अगले दिन 3 मार्च को शाम 5:08 बजे तक रहेगी। चूंकि प्रदोष काल में पूर्णिमा 2 मार्च को ही प्राप्त हो रही है, इसलिए होली पर्व का निर्धारण इसी दिन किया गया है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 2 मार्च को पूर्णिमा के साथ भद्रा का संयोग भी बन रहा है। भद्रा का समय शाम 5:56 बजे से रात्रि 5:32 बजे तक रहेगा। शास्त्रों में होलिका दहन के लिए भद्रा का त्याग आवश्यक माना गया है, लेकिन यदि भद्रा निशिथ काल (अर्धरात्रि) को पार कर ऊषाकाल तक पहुंच जाए, तो भद्रा युक्त प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा में भद्रा पुच्छ के समय होलिका दहन को श्रेष्ठ कहा गया है। प्रभु शास्त्री ने बताया कि 2 मार्च 2026 को भद्रा मुख का समय रात्रि 2:38 बजे से अलसुबह 4:38 बजे तक रहेगा, जिसे वर्जित माना गया है। इसके विपरीत भद्रा पुच्छ का समय रात्रि 1:26 बजे से 2:38 बजे तक रहेगा। शास्त्रों के अनुसार इसी अवधि में होलिका दहन करना सर्वाधिक उत्तम और फलदायी माना गया है।इस अवसर पर बैठक में दीपचंद शास्त्री, अंजनी शर्मा, चंद्रशेखर शर्मा, पियुष शर्मा, रामनिवास शर्मा, गोपीराम शर्मा, रणजीत शास्त्री तथा श्री गौशाला के प्रमुख सेवक अंजनी लढा भी उपस्थित रहे। सभी विद्वानों ने एक स्वर में कहा कि होलिका दहन केवल परंपरा नहीं, बल्कि शास्त्रीय नियमों से जुड़ा धार्मिक अनुष्ठान है। इसलिए आमजन को चाहिए कि वे निर्धारित शुभ समय का पालन करें और भद्रा काल में होलिका दहन से बचें। विद्वानों ने यह भी कहा कि शास्त्रोक्त विधि से किया गया होलिका दहन समाज में सकारात्मक ऊर्जा, सुख-समृद्धि और आपसी सौहार्द का प्रतीक बनता है।
